Wednesday, 24 August 2011

नारी समाज का आईना...

हर किसी लड़की का सपना है आसमान छूना,
            लेकिन क्या उसका कसूर है लड़की होना?
लड़की होने का ही उसे भुगतना पड़ता है खामियाजा,
            जिन्दगी के कई पहलुओं में करना पड़ता है समझौता।
बचपन से जवानी तक जो है अपने मां- बाप की छाया,
           फिर पूरी जिन्दगी सास- ससुर पति का उस पर साया।
बेटी, पत्नी, मां कई रूपों में जानी जाती है एक नारी,
          वही लक्ष्मी, दुर्गा, काली कई रूपों में पूजी जाती है एक नारी।
मानों तो कई देवियों की मूरत होती है एक नारी,
         ना मानों  तों एक भोग्या बन कर रह जाती है एक नारी।
पराये घर में है जो उसके सास- ससुर देवर नन्द
        मानों जैसे अपने ही हो मां- बाप, भाई, बहन
वही जब आये उसके अधूरे जीवन में बच्चे का साया।
       मानों जैसे कई जन्मों से हो उस रिश्ते से नाता।
खुद को गीले में और बच्चे को सुखें मे सुलाकर
      कई संधर्षो से बच्चें को बड़ा करती है मां
दुनिया की किसी कमी को अछूता न रखकर
      अच्छी से अच्छी सुविधाये देती है मां
लड़की से मां बनने तक का सफर
      हर किसी नारी के लिये है कठिन संघर्ष
 आंचल में दूध आंखों में पानी,
     नारी तेरी यही कहानी, नारी तेरी यही कहानी


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