Saturday, 3 March 2012

दें खुल के जीनें की आजादी.......

क्यों चाह कर भी इंसान,
           वो कुछ कर नही सकता।

जो उसका हक, अधिकार
          या जरूरत हैे होती।
ये बंदिशें और शक,
          करने की आदतें।
किसी भी इन्सान को खुल, 
          के जीने नही दे सकेगी।
दे अगर मां- बाप खुल
         के जीने अपने बच्चों को।
तो क्या पता उनके नाम से
         ही बन जाये पहचान उनकी।
ना कर समाज की चिंता
        तू अपने बच्चों के लिये।
ना देगा कल समाज,
          देगें बच्चें तूझे जीने के लिये।
क्योंकि समाज से ज्यादा जरूरत,
         होती हर किसी को परिवार की,
सही मायने में बच्चों की खुशी,
         ही हैं मां- बाप की असली खुशी।

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